प्रेग्नेंसी के दौरान जरुरी है, ग्लूकोज़ टोलेरेंस टेस्ट और उसकी जानकारी

प्रेग्नेंसी के दौरान कुछ टेस्ट करवाए जाने सुरक्षा की दृष्टि से बहुत जरुरी होते हैं। उन्हीं में से एक टेस्ट है ग्लूकोज़ टोलेरेंस टेस्ट। यह टेस्ट प्रेग्नेंट महिलाओं में इसलिए किया जाता है ताकि यह पता किया जा सके कि कहीं उसे जेस्टेशनल डायबिटीज (गर्भावस्था मधुमेह) तो नहीं है। इस स्थिति में शरीर जरूरत भर इन्सुलिन नहीं बना पाता है। जिसकी वजह से शरीर का ब्लड शुगर लेवल नियमित नहीं रह पाता है। जेस्टेशनल डायबिटीज की वजह से बेबी को परेशानी हो सकती है और इस प्रकार यह प्रेग्नेंसी को भी प्रभावित कर सकती है। इसका टेस्ट करवाना इसलिए जरुरी होता है क्योंकि इसके कोई दिखाई देने वाले लक्षण नहीं होते हैं।

आमतौर पर डॉक्टर 24वें से 28वें हफ्ते के बीच में ग्लूकोज टेस्ट करवाने की सलाह देते हैं        

टेस्ट की प्रक्रिया –

यह टेस्ट करने के लिए आपके शरीर से जाँच के लिए ख़ून का सैंपल लिया जाता है, जिसे टेस्ट किया जाता है। सैंपल लेने से पहले आपको एक गिलास हाई ग्लूकोज वाला लिक्विड पीने को कहा जाता है। उसके आधा घंटे बाद  जाँच के लिये रक्त निकाला जाता है, और इसकी जाँच की जाती है। यदि उस जाँच में ग्लूकोज लेवल अधिक मिलता है, तो लूकोज टॉलरेन्स टेस्ट करवाया जाता है।

ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट के लिए सबसे पहले फास्टिंग टेस्ट किया जाता है अर्थात 8 से 14 घंटे पहले कुछ भी खाया-पिया नहीं जाता है। यदि प्यास ज्यादा लगे तो डॉक्टर से पूछकर सादा पानी पिया जा सकता है। फास्टिंग के कम से कम 8 घंटे बाद जाँच के लिए ख़ून का पहला सैम्पल (फास्टिंग सैम्पल) लिया जाता है। उसके बाद आपको एक गिलास पानी में लगभग 75 ग्राम ग्लूकोज़ घोल कर दिया जाता है। उसके दो घंटे बाद ख़ून का दूसरा नमूना (पी.पी) लिया जाता है।

जाँच की रिपोर्ट और ट्रीटमेंट –   

यदि इन दोनों नमूनों के टेस्ट्स में आपका ब्लड शुगर लेवल काफी ज्यादा पाया जाता है तो उसको नियंत्रित करने के लिए ट्रीटमेंट किया जाता है। इसके लिए दवाएँ दी जाती हैं और गम्भीर स्थिति में इन्सुलिन इंजेक्शन भी दिए जा सकते हैं। दवाएं चलाने के साथ-साथ बीच-बीच में शुगर लेवल की जाँच कराई जाती है ताकि स्थिति का पता चलता रहे।

यदि ग्लूकोज टोलेरेंस टेस्ट में ग्लूकोज का लेवल बहुत ज्यादा नहीं पाया जाता है, तो डॉक्टर के द्वारा कुछ खान-पान सम्बन्धी सावधानियाँ बरतने और एक्सरसाइज आदि करने की सलाह दी जाती है। इससे ब्लड शुगर को नियंत्रित किया जा सकता है।

यदि प्रेग्नेंसी के दौरान ब्लड शुगर लेवल ज्यादा बढ़ा रहता है तो डॉक्टर डिलीवरी के बाद फिर से इस टेस्ट की सलाह दे सकते हैं, ताकि इस बात की पुष्टि हो सके कि डिलीवरी के बाद ब्लड शुगर लेवल नार्मल हो गया है या नहीं। आमतौर पर यदि किसी महिला को प्रेग्नेंसी के दौरान जेस्टेशनल डायबिटीज हो जाती है अर्थात उसका ब्लड शुगर लेवल बढ़ जाता है, तो डिलीवरी बाद धीरे-धीरे उसका ब्लड शुगर सामान्य स्थिति में आ जाता है।

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