“प्रेगनेंसी के 11वें हफ्ते के लिए जरूरी जाँचें “

प्रेगनेंसी के 11 वें हफ्ते में, अक्सर एन. टी  (न्यूकल ट्रांसलुसेंसी स्कैन) स्कैनिंग की जाती है। यह भी एक रूटीन स्कैनिंग ही है। यह स्कैन तब किया जाता है, जब गर्भ में पल रहे बेबी की गर्दन के नीचे तरल की मात्रा बढ़ जाये। इस स्थान को न्यूकल फोल्ड कहा जाता है। यहाँ पर, एक्स्ट्रा क्रोमोसोम भी हो सकते हैं। यदि बेबी की गर्दन के नीचे का भाग पारदर्शी है, तो अल्ट्रासाउंड की मदद से तरल को देखा जा सकता है।

जैसे-जैसे, बेबी का डेवलपमेंट होता है, न्यूकल फोल्ड की पारदर्शिता कम होने लगती है और अल्ट्रासाउंड में इसे देखना, मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, 11 हफ्तों में, अल्ट्रासाउंड के द्वारा, डाउन सिंड्रोम, जन्मजात हृदय दोष और अन्य जेनेटिक बिमारियों का भी पता लगाया जा सकता है।  

यदि स्क्रीनिंग के दौरान, बेबी में, किसी प्रकार के क्रोमोसोमल डिफेक्टस होने का खतरा नज़र आता है, तो डॉक्टर जिस भी जाँच के लिए आपसे कहे उसे जरूर कराएं।

हालाँकि, महज एनटी स्क्रीन रिजल्ट के द्वारा ही, इस समस्या की सही जानकारी नहीं मिल पाती, इसीलिए डॉक्टर इसके बाद, सेकंड ट्राइमेस्टर में, लेडी का ब्लड टेस्ट भी करवाते हैं। इस टेस्ट को क्वैड स्क्रीन (quad screen) कहा जाता है। इस टेस्ट में, प्रेग्नेंट लेडी के ब्लड में 4 डिफरेंट मार्कर की पहचान की जाती है। जिससे यह पता चलता है कि बेबी को कोई जेनेटिक डिफेक्ट होने का खतरा तो नहीं है।  

न्यूकल ट्रांसलुसेंसी स्कैन और क्वैड स्क्रीन, यह दोनों ही टेस्ट केवल यह देखने के लिए किये जाते हैं कि  बेबी में क्रोमोसोमल प्रॉब्लम होने की आशंका है या नहीं। इनके द्वारा इस बता की पुष्टि नहीं होती कि बेबी को क्रोमोसोमल डिफेक्ट है या नहीं। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि कुछ महिलाओं के यह दोनों ही  रिजल्ट एब्नार्मल रहे हों, लेकिन उन्होंने बिलकुल हेल्थी बेबी को जन्म दिया। इसी तरह यदि रिजल्ट बिलकुल सही आए तो इसका मतलब यह नहीं कि आपके बच्चें को कोई क्रोमोसोमल डिफेक्ट हो ही नहीं सकता। कहने का मतलब कि यह जाँच भी इतनी सटीक नहीं होती कि इनसे बच्चे में डिफेक्ट होने की 100% जानकारी मिल ही जाए।

फर्स्ट ट्रिमस्टर में की गई इन दोनों ही जांचों में, 80 % डाउन सिंड्रोम और 80 % ट्राईसोमी 18 प्रॉब्लम का पता लगाया जा सकता है।

रिस्क

यह दोनों टेस्ट करवाने से प्रेग्नेंट लेडी को कोई दर्द नहीं होता। केवल चिंता और डर हो सकता है। बहुत से मामलों में, इन दोनों टेस्ट से फॉल्स पॉजिटिव रिजल्ट आते हैं। इसलिए इन दोनों ही जांचों की सही जानकारी के लिए पहले अपने डॉक्टर से बात जरूर कर लें।  

 

loader