क्या प्रेग्नेंसी में नुक्सानदायक है पपीते और बैंगन जैसी चीजों का सेवन?

भारत एक ऐसा देश है, जहाँ प्रेग्नेंट वूमेन का खान-पान मेडिकल साइंस के अनुसार कम और पुराने रीती-रिवाजों,  सांस्कृतिक और धार्मिक विश्वासों या परिवार के सदस्यों के अनुसार ज्यादा होता है। यहाँ हम मेडिकल साइंस और सांस्कर्तिक रीती रिवाजों के बीच तुलना नहीं कर रहें हैं, बल्कि हमारा मकसद सिर्फ इतना है कि आहार जिस भी तरह का हो वह, प्रेग्नेंट वुमेन और उसके होने वाले बच्चे के लिए अच्छा होना चाहिए। प्रेगनेंट महिला का आहार, संतुलित होना बहुत जरूरी होता है। यह भी माना जाता है कि गर्भावस्था के दौरान, ज्यादा गर्म या ठंडे और खट्टे खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। पपीता, अनानास, केला, आम, मछली , अंडे, मूंगफली, चना, ज्वार, बाजरा, बैंगन, भिंडी, तिल के बीज, सन बीज, मेथी और गुड़ ऐसे ही खाद्य-पदार्थ हैं, जिन्हें खाने की सलाह प्रेग्नेंट वुमेन को नहीं दी जाती। हालाँकि, इन चीजों के सेवन पर मेडिकल साइंस की तरफ से कोई अप्रूवल नहीं है, लेकिन फिर भी भारतीय परम्परा और डॉक्टर भी पहले तीन महीनों में इन चीजों के सेवन को ठीक नहीं मानते। जैसे-

  • पपीता- भारतीय महिलाएं गर्भपात के डर से, गर्भावस्था के दौरान, पपीते का सेवन नहीं करती। भले ही यह मेडिकली प्रूव्ड नहीं है, लेकिन पहले तीन महीनों में, डॉक्टर भी इसे खाने की सलाह नहीं देते। हालांकि, यदि पपीता पका हो तो यह नुक्सानदायक नहीं होता, लेकिन पपीता यदि कच्चा हो, तो इसका सेवन सुरक्षित नहीं माना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि, कच्चे या अधपके पपीते में, लेटेक्स नामक पदार्थ होता है, जो गर्भाशय के संकुचन को बढ़ा सकता है।  
  • बैंगन- आम तौर पर, बैंगन भारतीय घरों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाली सब्जियों में, से एक है। इसे डायुरेटिक कन्टैनिंग पिटोहार्मोन्स के रूप में भी जाना जाता है, यानी यह मूत्र वर्धक के तौर पर, कितनी ही बिमारियों से बचाता है। इसे प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम और अमीनोरहा के उपचार के तौर पर भी प्रयोग किया जाता है। दरअसल इसे प्रेगनेंसी के लिए सही इसलिए नहीं माना जाता क्योंकि इसकी प्रकृति (तासीर) गर्म होती है और गर्म चीजों का सेवन प्रेग्नेंसी में ठीक नहीं होता।
  • तिल- तिल के बीज, या इसके तेल का प्रयोग गर्भपात की दवा के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। इसके अलावा, एक दिन में, दो बार गुड़ के साथ इसके बीज का सेवन करने से गर्भपात हो जाता है। इसके अलावा तिल का बीज गर्भाशय की मांसपेशियों को उत्तेजित कर देता है, इससे यूट्रस में संकुचन होने लगता है और इससे निषेचित अंडा बाहर निकल जाता है।
  • मसालें और जड़ी बूटियां- सौंफ़ और मेथी के बीज, दोनों का सेवन गर्भावस्था के दौरान, उचित नहीं माना जाता, क्योंकि, इन बीजों में फाइटोएस्ट्रोजेंस पाया जाता है जो, महिला एस्ट्रोजन हार्मोन को बढ़ावा देता है और गर्भाशय के संकुचन को प्रेरित करता है। हालाँकि, पारंपरिक चिकित्सा में, सौंफ और मेथी के बीज का प्रयोग पीरियड्स शुरू करने, हार्मोन संबंधी विकारों के इलाज और दूध उत्पादन के लिए किया जाता है।
  • एमएसजी- प्रेग्नेंट वुमेन को खाने में, स्वाद बढ़ाने वाली चीजों जैसे अजीनोमोटो के प्रयोग से बचना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि, यह मस्तिष्क की कोशिकाओं और भ्रूण के विकास में बाधा उत्पन्न कर सकता है।
  • नरम चीज- नरम चीज़ों, खासकर पनीर और उनसे बने खाद्य -पदार्थों जैसे- टिक्का और कच्चे पनीर के सैंडविच आदि के सेवन से बचें, क्योंकि पनीर ताजा है या नहीं, यह पता करना बहुत ही मुश्किल है। क्योंकि इससे ब्री, कैमेम्बर्ट, रोकफोर,फेटा और गौरगोनजोला होने का खतरा होता है।

कुछ खास प्रकार के मांस और मछली- भारत के लोग ज्यादातर फिश फ्राई और इसकी करी बड़े चाव से खाते हैं। लेकिन, यदि यह थोड़े भी कच्चे रह जाएँ तो इनका सेवन बहुत हानिकारक हो सकता है। क्योंकि इनमें हानिकारक जीवाणु होने की संभावना रहती है। इसलिए हमेशा अच्छे से पके हुए मांस और मछली का ही सेवन करें।   

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