पलक झपकते करें, अपने शिशु की बीमारियों की पहचान

पेरेंट्स के लिए सबसे मुश्किल काम होता है अपने नवजात शिशु की बिमारियों के बारे में पता लगाना। क्योंकि, छोटे बच्चे अपनी तकलीफ किसी से शेयर नहीं कर पाते हैं। ऐसे में पेरेंट्स की पूरी जिम्मेदारी होती के कि शिशु की बीमारी के लक्षणों की जानकारी हासिल कर उन पर नजर बनाए रखें। साथ ही किसी प्रकार के लक्षण नज़र आते ही तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। हालाँकि, कुछ तरकीबें बताई जा रही हैं, जिसके जरिए आप शिशु की समस्या को पहचान सकती हैं, जो निम्न हैं-

  • खांसी के लक्षण-  खांसी होने के दौरान शिशु के शरीर के अंदर एक तरह की चुभन सी महसूस होती है। जिसे वह दूर करने की कोशिश करता है। साथ ही लगातार खांसने और और गले से घरघराहट की आवाज भी खांसी की एक पहचान है। इस तरह के लक्षण सामने आते ही तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
  • दस्त की पहचान- दस्त के दौरान शिशु लगातार पतला या बदरंग मल त्याग करता है, तो यह दस्त का संकेत माना जाता है।  अगर दस्त के साथ-साथ उल्टी और बुखार की समस्या हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
  • बुखार के लक्षण- बच्चों में बुखार के लक्षण जल्दी समझ में आ जाते हैं, जैसे कि शरीर का तापमान बढ़ जाना, सुस्ती, भूख न लगना जैसे लक्षण हो सकते हैं। हालाँकि, इस बात का ध्यान जरूर रखें की शिशु का तापमान 104-105 डिग्री फैरेनहाइट से आगे न बढ़ने पाए, क्योंकि यह शिशु के लिए घातक हो सकता है।
  • सर्दी-जुकाम के संकेत- जुकाम का सबसे मुख्य लक्षण बहती नाक और खराश है। इसके अलावा, नाक से पानी निकलना और साथ ही नाक का बंद होना भी जुकाम के संकेत माने जाते हैं। हालाँकि, शिशुओं को सर्दी-जुकाम से ज्यादा परेशानी वास्तव में नाक बंद होने से होती है, क्योंकि ऐसे में दूध पीते समय या सोते समय सांस लेना मुश्किल हो जाता है, ऐसे में डॉक्टर से संपर्क करें।
  • पेट दर्द के लक्षण- ज्यादातर बच्चे पेट दर्द की समस्या से ज्यादा परेशान होते हैं, ऐसे में इसके लक्षणों में शिशु के पेट चढ़े (फूले) हो सकते हैं, टॉयलेट का रुकना, पेट को छूने भर से बच्चे का जोर से रोना आदि इसके संकेत हो सकते हैं। हालाँकि, बच्चों में इस तरह की ज्यादातर समस्या माँ के खान-पान के कारण होता है। क्योंकि, आप जो कहती हैं वह शिशु दूध के जरिए लेता है।

ऐसे में सबसे जरूरी बातें यह है कि माँ को अपने बच्चे की हर एक छोटी-छोटी गतिविधियों पर नज़र रखनी चाहिए, ताकि शिशु के अंदर किसी भी समस्या को पहचान सकें।

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