क्या लड़कियों की अपेक्षा लड़को को पालना आसान हैं ?

भारतीय समाज में लोगों का लड़के और लड़कियों को अलग -अलग नज़र से देखने का परम्परा  हैं। जैसा कि हम ये भी जानते हैं कि भारत पुरुष प्रधान देश है। जहाँ पर लोग पुरषों को ज़्यादा सम्मान देते हैं। अपेक्षा लड़कियों या महिलाओं को।  अब हम बात करते हैं उनके परिवरिश की क्या लड़के और लड़की को एक ही सामान देख -रेख होती हैं। अक्सर कुछ घरों में लड़के और लड़कियों की देख -रेख में थोड़ा बहुत फर्क देखने को मिल जाता है। लोग ज़्यादा लड़को को जिम्मेदार समझते हैं। चाहे उनको घर से बाहर रहना हो ,शॉपिंग करना हो आदि कि जिम्मेदारी पेरेंट्स आसानी से उनको दे देते हैं पर लड़कियों ऐसी जिम्मेदारी देने में कतराते हैं। उनको तो बस चहर दीवार के अनदर तक सीमित रखते हैं। फिर अब कुछ लोगों की सोच बदल गयी है। पेश है कुछ सुझाव :-

1 -बोल चाल में अंतर :- अक्सर घरों में बच्चे में ये फर्क देखा जाता है कि लड़के कोई बात पेरेंट्स को घुमा कर नहीं  बोलते हैं। उनको जो बोलना होता है, सीधा पेरेंट्स से बोल देते हैं। लेकिन अगर इसी बात को लड़की को पेरेंट्स से बोलनी होती है, तो वो हर बात को सीधे तरीके से नहीं कह पाती हैं।  घुमा-फिरा कर कह पाती हैं।  क्योकि उनके अंदर डर की भावना रहती है भले ही वो किसी भी लहजे से गलत न हो। हमे ऐसा लगता यहाँ हमारी बेटी की गलती नहीं है, उनको हम बचपन से ही उतनी आज़ादी नहीं देते कि वो अपने मन की बात से फाटक से किसी से बोल दें। लड़कियों को हमेशा दब कर रहने की बात की जाती हैं।

 

2 -ग्रुप का होना :- लड़को का एक अच्छा गुट देखने को मिलता है।चाहे वो खेल में हो या पार्टी या पढाई में लड़के हर  काम ग्रुप में करते है।  लड़के अपने गुट में हर लड़के को  आसानी से जोड़ लेते है। पर अगर बात की जाये लड़कियों की तो उनके एक सहेली या दो सहेलियाँ ही होंगी। क्योंकि लड़कियों में जलन की भावना होती है। अक्सर लड़कियां कोई काम एक या दो सहेलियों के साथ करने में खुद को अच्छा महसूस करती हैं। जिससे लड़कियों में ग्रुप का कम होना दिखाई देता है।

3 -आत्मसम्मान का होना :- लड़कियों में आत्म सम्मान की  भावना ज़्यादा होती हैं अपेक्षा लड़कों के। लड़कियां सौन्दर्य से लेकर घर के काम या स्कूल होम वर्क में पूरा समय देती हैं। पर इसी जगह अगर लड़कों की बात की जाये। तो वो हर काम को उतना सीरियसली नहीं लेते है।  अभी नहीं किया है, तो क्या हुआ कर लेंगे अभी थोड़ी देर में।  जैसा जबाब होता है लड़कों का। लड़कियां घर से बाहर निकलने में बहुत डरती हैं। कहीं अगर कुछ गलत हो गया, तो पेरेंट्स को क्या जबाब देंगीं। इसी जगह लड़को की बात की जाये तो उनको इन सब बातों की कोई मायने नहीं  होता  है।

4 -ज़्यादा सोचने की आदत:- जहाँ तक ये बहुत काफी हद तक सही साबित हुआ है कि लड़कियां हर बात को बहुत गहराई तक सोचती रहती हैं। लड़कियों में ज़्यादा सोचने की आदत होती है। पर लड़को में ये आदत नहीं होती है। वो किसी भी बात को सीने से लगा कर नहीं रखते है। पर अगर लड़कियों की बात की जाये। तो उनमे सोचने की क्षमता ज़्यादा होती है। और भावुक भी जाती हैं।

5- पहनावे का विशेष होना :-  जैसा की हम जानते हैं कि हर पेरेंट्स के लिए कि वो लड़कों के लिए आसानी से ड्रेसेस खरीद लेते हैं पर उसी जगह लड़की के लिए कपडे खरीदने होते है तो उनको  थोड़ा -सा सोचना पड़ जाता है।  क्या मेरी बेटी ये ड्रेस पहनेगी भी या नहीं। अक्सर लड़कियों में यह आदतें होती है, कि ड्रेस उनके पसंद के रंग का हो और उन पर जो ज़्यादा फब रहा है। वही पहनेगी भले ही उस पर पैसे कितने लग जाये। लेकिन इन सब बातों का लड़कों में कोई महत्व नहीं होता है।  वो हर कपडे पहनने में कम्फ़र्टेबल होते हैं।

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