जब बच्चे को बतानी हो अपनी गंभीर बीमारी के बारे में

बच्चों को किसी गंभीर बीमारी के बारे में बताना बहुत मुश्किल है। ये काम और मुश्किल तब होता है जब आपको पता हो कि आपके पास समय बहुत कम है। ये बात अगर बच्चों को बतायी जाती है तो वे जीवन की अनिश्चितता को समझ पाएंगे। इसके साथ ही इस बात का भी ख्याल रखना जरूरी है ह िउनके बचपने पर इसका कोई असर न पड़े। बीमारी को इस तरह न बताएं कि ये उनके लिए कोई अड़चन है।कुछ ऐसा रास्ता निकाले जिससे बच्चा आपके प्यार को समझे और आप पर और विश्वास करे। यहां हम आपको कुछ ऐसे ही टिप्स बता रहे हैं। इससे बच्चों को आप आसानी से इस गंभीर समस्या के बारे में बता सकेगें।

कब और कैसे बात करें- इस बारे में सोचंे कब और कैसे बच्चे को बताना है। हां, ये बात जरूर याद रखें की सोने के पहले इस बारे में कतई बात न करें। इतना ही नहीं बाहर जाने के बजाय घर में बैठकर बात करें। कोशिश ये करें परिवार का कोई और सदस्य भी आपके साथ हो। इस दौरान अपने हाव-भाव पर ध्यान रखें। आपके भावुक होने से आपका बच्चा परेशान हो सकता है। बच्चे की क्षमता को ध्यान में रखकर ही बात का जि़क्र करें। उसकी उम्र को देखकर ही बताएं कि आपको दिक्कत है।

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बताएं वज़ह- घर में अगर कोई बीमार हो जाता है। तो एक साथ कई सारी जिम्मेदारियां आ जाती हैं। डाॅक्टर का अपाॅइंमेंट, चेकअप, दवा और डाइट सबकुछ करना पड़ता है। ऐसे में कई बार बच्चे के लिए समय कम हो जाता है। उसे बुरा लगे या वो कुछ और दिमाग में पाल ले। इससे पहले उसे बता दें दादाजी, पापा, मम्मी जिसे भी बीमारी है उसके बारे में बताएं। उसे वज़ह बताएं कि दवा और डाॅक्टर के पास जाने के कारण उसको समय कम दे पा रहे हैं।

ज्यादा समय नहीं बेहतरीन समय बिताएं- बच्चे को ऐसे में समय नहीं दे पाना लाज़मी है। इस दौरान इस बात को ध्यान में रखें कि जब भी आप बच्चे को समय दें। पूरी तरह समर्पित रहें। उसे बताएं कि आप उसे मिस करते हैं। बीमारी के प्रति उसकी सोच और भावनाएं को जानने की कोशिश करें।

– अगर वो व्हिलचेयर को चलाने और खाना परोसने में मदद करना चाहते हैं। तो बच्चों की इस बात की तारीफ करें।

-बच्चा आपके साथ अस्पताल जाना चाहता है तो उसे इसे स्थिति के लिए तैयार करें। उसे बताएं कि कहां और कैसे वो आपकी मदद कर सकता है।

 

दें थोड़ी जानकारी- बच्चे को एक साथ जानकारी न दें। उसे थोड़ी-थोड़ी जानकारी देना ज्यादा बेहतर होगा। एकबार में उतना ही बताएं जितना वो समझ सकते हैं। इससे उनको जानकारी जुटाने का मौका मिलेगा और वो सवाल पूछ सकेंगे। उनसे ये जानके की कोशिश करें कि दूसरों से उन्होंने क्या सुना है। उनको क्या नहीं समझा है। उनकी बातों को ध्यान से सुनें और फिर उनकी मदद करें।

हिम्मत दें उनको- आपके फोन काॅल, रिश्तेदारों के आने-जाने से बच्चों को एहसास हो जाता है। उनको ये तो नहीं पता चलता कि असल वज़ह क्या है, मगर वो ये जरूर जाते हैं कि कुछ गड़बड़ है। ऐसे में वो डरते भी हैं। उनको सवाल पूछने के लिए उत्साहित करें। इस दौरान उनसे कुछ छुपाएं नहीं उनको ईमानदारी से बताएं कि बीमारी क्या है। उनसे ज़बरदस्ती कतई न करें अगर वो कुछ नहीं पूछना चाहते हैं।

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बच्चे और उनकी उम्र- 18 महीेने के बच्चे में इतनी समझ आ जाती है कि उनके आसपास क्या हो रहा है। ये बहुत जरूरी है कि अपने बच्चे को ईमानदारी से बताएं कि आप बीमार हैं। इससे वो खुद से कुछ बुरा नहीं सोचेंगे। बच्चा अगर बड़ा है या उसकी उम्र दो साल से सात साल के बीच है तो वो कैंसर को समझ पाएगा। उसे बताएं कि डाॅक्टर ने आपको ये बीमारी बतायी है। डाॅक्टर आपको ठीक करने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा उसे ये भी  बताएं कि पहले कि तरह शायद आप उसके साथ नहीं खेल सकेंगे। ये बताने में अगर खुद सक्षम नहीं हैं तो किसी रिश्तेदार ये दोस्त की मदद लें। जो आपके बच्चे के करीब हो और उसके सवाल का जवाब दे सके।

आसान शब्दों में करें बात- बच्चे से बात करने के लिए आसान शब्दों का इस्तेमाल करें। इस तरह बात करें कि वो आसानी से समझ सकें। उदाहरण के लिए डाॅक्टर को डाॅक्टर ही कहें न आॅन्कोलाॅजिस्ट। इसके अलावा अगर आपकी केमोथैरपी चल रही है तो उसे मेडीसिन बोलें। उनको ऐसी किताब दें जिसमें कैंसर के बारे में लिखा हो। आजकल बच्चों के लिए भी ऐसी किताबें आ चुकी हैं। डाॅक्टर और नर्स की मदद से उनको आप ये बुक दिला सकते हैं।

 

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