भारत और यूएस में बच्चों की परवरिश

बच्चों की परवरिश पूरी दुनिया में बहुत बड़ी बात होती है। फिर भी अगर आप भारत के बाहर बच्चे की परवरिश करते हैं तो बहुत कुछ बदलता है। वहां की जीवनशैली, आब-वो-हवा से लेकर परंपरा तक सबकुछ अलग होता है। क्या अंतर है यूएस और इंडिया की परवरिश में, यहां हम कुछ छोटेे-छोटे अंतर से आपको अवगत करा रहे हैं।

बर्थ क्लास- बच्चे के जन्म के पहले यहां पर पैरेंटस साथ जाते हैं और बर्थिंग क्लास में हिस्सा लेते हैं। जहां पर पत्नी को प्रसव पीड़ा के वक्त पति कैसे मदद करे और क्या करे अगर पत्नी को कोई समस्या आती है। इसके अलावा बच्चे को कैसे स्वैडल करना है या कैसे डायपर बदलना ये सब भी सिखाया जाता है। ये सब वो इसलिए सीखते हैं ताकि वो लेबर रूम में अपनी पत्नी के साथ रहें। वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो क्लास जो नहीं जाते मगर लेबर रूम में पत्नी के साथ रहते हैं। बात अगर भारत की करें तो यहां न पति ये जहमत उठाना चाहते हैं और अस्पताल उनको इसका आदेश भी नहीं देता है। वैसे भी हमारे देश में बच्चे को पैदा करने से लेकर उनकी परवरिश तक सबकुछ मां की जिम्मेदारी मानी जाती है पिता का इससे कोई लेना देना नहीं होता।

अकेले सोना- यूएस में बच्चे के जन्म से ही उनका कमरा अलग होता है। वो अलग सोता है इसके लिए बहुत मेहनत भी करते हैैं। नए बच्चे के दुनिया में आने के साथ ही उनके कमरे का डेकोरेशन भी शुरू हो जाता है। बच्चा अगर बेटा है तो उस हिसाब से कमरे को सजाया जाएगा और अगर बेटी है तो उसके मुताबिक, खैर भारत में ऐसा नही होता है।

खाने पर हिदायत- भारत में खाने के लिए हमेशा से हिदायत का दौर रहा है। यहां बच्चे के जन्म के बाद ही उसको शहद खिलाने की भी परंपरा है। कई बार इस परंपरा के चलते कई इंफेक्शन भी हो जाते हैं। वहीं अगर बच्चा थोड़ा भी बड़ा होता है या पाचन में कोई समस्या आती है तो उसे दादी, नानी केला खाने के लिए बोलती हैं। वहीं यूएस में अगर डारिया जैसी दिक्क्त आती है तो उसे बीआरएटी डाइट दी जाती है यानी बनाना, राइस, एप्पल और टोस्ट।

बच्चे को खुद से खाने दें- ये सिर्फ भारतीय तरीका ही है कि बच्चे को अपने हाथों से खिलाओ। हमारे देश में बच्चे को ऐसी आदतें लगायी जाती है। वहीं यूएस में बच्चे को हाय चेयर पर बिठा दिया जाता है और वो खुद से खाते हैं। हालाकि शुरुआत में उनको दिक्कत होती है काफी गंदगी भी फैलाते हैं फिर वो सीख जाते हैं।

टाइम मैनेजमेंट - यूएस में बच्चे को शुरु से ही समय के बारे में सीख दी जाती है। इसके अलावा बच्चे को पालने के लिए टाइम मैनेजमेंट बहुत जरूरी है। वहां पर उनके सोने और खेलने हर चीज का समय निर्धारित है। वहीं भारत में ऐसा कतई नही है।

बेड टाइम- वहां पर बच्चों को जल्दी सोने की आदत लगायी जाती है। इसके लिए कई सारी किताबें भी मौजूद हैं। जिनसे पढ़कर सीखा जा सकता है। यूएस के पैरेंटस का मानना है कि बच्चे के लिए सोना बहुत जरूरी है। वहीं भारत में ऐसा बिल्कुल नहीं है कई बच्चे को आपने माता-पिता के साथ ही सोते हैं। यहां ऐसा कोई नियम नही है।

खेल को महत्व-बच्चा जब थोड़ा बड़ा होता है तभी से यूएस में उनके खेलने को महत्व दिया जाता है। वहां के टोडलर को भी स्वीमिंग, बेसबाॅल और फुटबाॅल की क्लास लगायी जाती है। वहीं भारत में इसे इतना महत्व नहीं दिया जाता है।

आत्मनिर्भरता का पाठ-बच्चों का आत्मनिर्भर होना चाहिए, ये सीख यूएस कुछ जल्दी ही देता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है उसके खाने, पीने और कपडे़ पहनने की आदत डालनी पड़ती है। इसके बाद उनके उम्र के अनुसार उनको घर के काम भी बांट दिए जाते हैं। वहीं जब वो बालिग होने लगते हैं उनको समर वेकेशन में जाॅब की भी सलाह दी जाती है, दरअसल वो खुद करते हैं ताकि अपने खर्चे निकाल सकें। जैसे-जैसे वो कमाना शुरू करते हैं उनको परिवार में खर्च करने की जिम्मेदारी दी जाती है फिर चाहे वो रेंट शेयर करना हो या कोई और खर्च। ऐसा भारत में नहीं होता है।

Featured image Sambhav with his friend

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