बच्चों में होने वाले शुरुआती 7 बीमारियाँ, भूलकर भी न करें नज़रअंदाज़ !

जन्म के बाद बच्चों में आए दिन कुछ न कुछ समस्या उत्पन्न होने लगती है, जो कि बेहद आम बात है। हालाँकि, इस तरह की समस्या छोटे बच्चों में इसलिए उत्पन्न होती हैं क्योंकि इन दिनों उनकी इम्युनिटी काफी कमजोर होती हैं, जिससे कि वह बहुत जल्दी किसी बीमारी या संक्रमण की चपेट में आ जाते हैं। खासकर, ठंड के मौसम में बच्चे सबसे अधिक बीमार पड़ते हैं। इसलिए, आज निचे बच्चों में होने वाले सबसे आम बिमारियों के बारे में बात की जा रही है, जिसका ध्यान आपको दिया जाना चाहिए-

पीलिया

यह नवजात शिशु में जन्म के तुरंत बाद होने वाली सबसे आम बीमारी है, इसलिए इसमें घबराने वाली बात नहीं है। हलांकि, किसी भी स्वस्थ नवजात में पीलिया की स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब उसके खून में बिलीरुबिन की अतिरिक्त मात्रा बढ़ जाती है। आमतौर पर, बिलिरुबिन एक रसायन (केमिकल) होता है, जो कि शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं के सामान्य रूप से टूटने पर बनता है। इसलिए, नवजात शिशु में बिलिरुबिन का स्तर ज्यादा होता है, क्योंकि उनके शरीर में अतिरिक्त आॅक्सीजन वहन करने वाली लाल रक्त कोशिकाएं होती हैं। चूंकि नवजात शिशु का यकृत अभी पूरी तरह परिपक्व नहीं हुआ होता है, इसलिए यह अतिरिक्त बिलिरुबीन का अपचय नहीं कर पाता। लेकिन, डॉक्टर की देखरेख में यह हफ्ते भर में ठीक हो जाता है।

निमोनिया

यह भी बच्चों में होने वाला एक आम संक्रमण है जो फेफड़ों में इंफेक्शन के कारण उत्पन्न होता है।  इसके कारण फेफड़ों में सूजन आ जाती है और तरल पदार्थ भर जाता है, जिससे न केवल खांसी की समस्या होती है बल्कि सांस लेने में भी परेशानी होती है। बच्चों में यह समस्या आमतौर पर सर्दी के दिनों में होती है। इसलिए, अपने शिशु के लक्षणों पर लगातार नजर बनाए रखें ताकि परेशानी ज्यादा न बढ़ने पाए। साथ ही यदि आपका बच्चा स्तनपान करने या सांस लेने में तकलीफ महसूस कर रहा हो तब तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

वायरल इनफेक्शन

छोटे बच्चों की इम्युनिटी इतनी कमजोर होती है कि वह वायरल बुखार या फ्लू के चपेट में जल्दी आ जाते हैं। आमतौर पर, कुछ विषाणु आपके शिशु को बीमार बना सकते हैं। ये संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने से फैलते हैं। इसलिए, यदि घर में किसी भी व्यक्ति को इस तरह के संक्रमण हो तो उन्हें शिशु से दूर रहने की सलाह दें। साथ ही, अपने बच्चे को जल्द से जल्द डॉक्टर के पास ले जाएँ। हलांकि, अगर आपके बच्चे की उम्र छह महीने से लेकर दो साल के बीच है, तो आप उसे फ्लू के खिलाफ प्रतिरक्षा के लिए सालाना टीका लगवा सकती हैं।

दस्त

बच्चों में दस्त न हो ऐसा हो ही नहीं सकता, क्योंकि बच्चे सबसे अधिक शिकार इन्हीं चीज़ों से होते हैं। इसका सबसे आम कारण एक विषाणु है, जिसका नाम है रोटावायरस। यह विषाणु अंतड़ियों को संक्रमित करता है, जिससे गैस्ट्रोएंटेराइटिस होता है। यह आंत की अंदरुनी परत को क्षति पहुंचाता है। इसके लिए आप उसके शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) न होने दें। अगर आपका शिशु उचित मात्रा में स्तनपान या फॉर्मूला दूध पी रहा है, तो उसे समय-समय पर देती रहें इसे बंद न करें।

पोलियो

आज के समय में पोलियो के बहुत मामले देखने को मिलते हैं, क्योंकि सरकार ने इसके खिलाफ बहुत हद तक काबू पा लिया है। नहीं, तो यह शिशु के दिमाग और मेरुदंड पर हमला करता था और उनमें लकवे के कारण को उत्पन्न करता था। हालाँकि, यह समस्या किसी संक्रमित व्यक्ति के मल, बलगम या थूक के संपर्क में आने से फैलता है। आपके शिशु को मौखिक पोलियो टीका (ओ.पी.वी.) और इंजेक्शन से लगने वाला पोलियो टीका (आई.पी.वी.) दोनों संयुक्त रूप से दिए जा सकते हैं। इसलिए, अपने बच्चे को पोलियो की खुराक पिलाना न भूलें।

खसरा

यह एक अत्याधिक संक्रामक रोग है, और यह संक्रमित व्यक्ति के छींकने या खांसने से फैलता है। यह जुकाम और बुखार के साथ शुरु होता है। दो दिन के बाद दाद दिखाई देते हैं। खसरे की वजह से श्वासनली-शोथ (ब्रोंकाइटिस), फेफड़ो का संक्रमण (ब्रोन्कियोलाइटिस), कान का संक्रमण और बच्चों में कण्ठ रोग (क्रूप) भी हो सकता है।

चिकनपॉक्स

इसे छोटी माता के नाम से भी जानते हैं, यह बच्चों में बहुत व्यापक तौर पर देखने को मिलता है। इसमें विशेष खुजली वाले दानें, छाले और हल्के फ्लू जैसे लक्षण होते हैं। अगर, आपके शिशु को पहले एक बार छोटी माता हो चुकी है, तो भविष्य में इसके दोबारा होने की संभावना बहुत कम होती है।

हालाँकि, इन सब के अलावा बच्चों में पेट दर्द, कान में संक्रमण, उल्टी आदि की समस्या बनी रहती है, जो कि बड़े होने के बाद खुद ब खुद खत्म हो जाती है। क्योंकि, जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं उनकी इम्युनिटी मजबूत होने लगती है।   

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