अवसाद आंतरिक विकार

अवसाद  ऐसा आंतरिक विकार है जो बाहरी दुनिया को नहीं दिखता पर वह दूसरो से खासकर हमारे परिवार से हमारे रिश्तो पर बुरा प्रभाव डालता है। बच्चो की सीधी सरल दुनिया ऐसी होती है कि उन्हें अवसाद का मतलब नहीं समझाया जा सकता। फिर भी माता-पिता के व्यवहार में अंतर बच्चे महसूस कर लेते है जिस वजह से वें एक समय के बाद उनसे कटने लगते हैं और बातें छिपाने लगते हैं। डिप्रेशन के दौर में हमें बच्चो के प्रति अपने व्यवहार में इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए : –
1 – बच्चो के खान-पान और पोषण से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। इस आयु में उनके अंग, दिमाग का विकास हो रहा होता है और आप नहीं चाहेंगी कि आने वाले जीवन में इस बात का उनपर बुरा असर पड़े।
2- अस्थाई मानसिक वेदना का रोष अपने बच्चो पर कभी ना निकालें। वह कारण जिस से आप परेशान थी, हो सकता है कुछ समय में चला जाए पर बच्चो के मन में आपसे डर या दूरी शायद कभी ना मिट पाये। स्वयं को याद दिलाती रहें कि यह एक टेम्पररी फेज़ है जो जल्द ही ठीक हो जाएगा।
3 – ज़रुरत से अधिक ना सोचे, स्वयं को दिनचर्या के कामों में व्यस्त करें ताकि बच्चो के सामने आप एक दार्शनिक की तरह ब्लेंक स्टेयर (एकटक एक स्थान को देखना) ना करें और वह अपने मन से कुछ नकारात्मक अज़्युम ना कर लें। खुद को व्यस्त करने से अवसाद कम होता है और दिनचर्या वापस पटरी पर आती है।
4 – ध्यान रखें अभिभावक अपने बच्चो के सबसे पहले रोल मॉडल (आदर्श) होते है। उनके सामने अपनी यह छवि बनाये रखें अगर आप बच्चो के सामने रोएंगी, चिल्लाएंगी तो आपकी ये छवि धूमिल हो जायेगी जिसके परिणामस्वरुप आगे शायद बच्चे आपकी बातें अनसुनी कर ना माने।
5 – अगर गलती से बच्चा आपके द्वारा कोई हिंसा, निराशा में कोई बात देख या सुन ले तो घबरायें नहीं। उसे समझाएं कि आपसे गलती हुयी है और ऐसा व्यवहार किसी के लिए भी ठीक नहीं।
6 – अवसाद के समय बच्चे की सारी ज़िम्मेदारीयो का भार अपने पार्टनर पर ना छोड़ें। ना ही उनसे सबकुछ अपेक्षित करें, बीच-बीच में उन्हें ब्रेक दें और उनकी मदद करती रहें।
7 – कुछ हफ्तों या महीनो के लिए अपने परिवार के किसी विश्वासपात्र सदस्य को (जैसे बच्चे की दादी, नानी, बुआ, चाचा आदि) को बच्चो की अच्छी परवरिश में  मदद के लिए बुला लें।
8 – आप चाहें तो अपने नज़दीकी पड़ोस और बच्चे की टीचर्स को स्थिति के बारे में थोड़ा बता सकतीं है ताकि किसी इमरजेंसी की स्थिति में वो बच्चों और आपकी मदद कर सकें। बच्चों को कुछ महत्वपूर्ण फ़ोन नंबर्स और पते याद करवा दें।
9 – अपनी दवाइयों, थेरेपी से जुडी चीज़ों को ऐसे स्थान पर रखें जो बच्चो की पहुँच से दूर हों। अपने पार्टनर और घर के अन्य सदस्यों को भी उन चीज़ों पर नज़र रखने का आग्रह करें।
10 – अगर मानसिक तनाव का समय लंबा खींच जाता है तो अपना एक निश्चित रूटीन बना लें। उस रूटीन में नियमित रूप से ऐसी बातें शामिल रहनी चाहिए जो  बढ़ती आयु के बच्चो का सही मानसिक और शारीरिक विकास सुनिश्चित करें। साथ ही बदलते परिवेश के अनुसार अपने रूटीन में ज़रुरत अनुसार बदलाव करते रहें।

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