ऐसे सिखाया मैंने अपने 1 साल के बच्चे को पॉटी करना

बच्चों के जन्म के बाद सबसे कठिन काम होता है बच्चों को पॉटी कराने के तौर तरीके सिखाना। ज्यादातर पेरेंट्स अपने बच्चे को 3 साल से पॉटी की ट्रेनिंग देना शुरू करते हैं। लेकिन, आज एक ऐसी माँ के बारे में बात कर रही हूँ जिन्होंने अपने बच्चे की पॉटी ट्रेनिंग एक साल की उम्र में ही दे डाली। और यह इस बात के लिए गर्ब महसूस करती हैं, और कहती हैं कि मैं अन्य माओं से इस मामले में आगे निकल गई। साथ ही इन्होंने कहा कि जब भी मैं अपने दोस्तों को दो साल या उससे अधिक उम्र तक के बच्चों के साथ पॉटी के लिए मेहनत करते हुए देखती हूँ तो मुझे अच्छा नहीं लगता है।  

हालांकि, आशा पणिक्कर का कहना है कि मैं पारंपरिक तरीकों और प्रथाओं में विश्वास रखती हूँ। यह तीन बच्चों की माँ हैं, जो एक 10 साल और बाकि के दो बच्चे 4 साल के हैं। ऐसे में, बच्चों के जन्म के बाद इनकी कुछ दोस्तों ने इन्हें बच्चों की देखभाल के लिए किताब और डॉक्टर की मदद लेने की सलाह दी। लेकिन, इन्होंने किसी की नहीं सुनी और अपने माँ और दादी के बताए हुए रास्ते को चुना। और आज इनके बच्चे की इम्युनिटी दूसरे बच्चों के मुकाबले ज्यादा मजबूत हैं, इतना ही नहीं इनके बच्चे खाने में भी न-नुकर नहीं करते हैं, और सबसे जो अच्छी बात है वह यह है कि ये सारे बच्चे पॉटी में वेल ट्रैंड हैं, वह भी एक साल से दो साल के अंदर।

इनका मानना है कि भले ही पॉटी ट्रेनिंग का यह प्रक्रिया “डाउन मार्केट” की तरह लगे, लेकिन सच तो यह है कि यह सबसे आसान और सरल तरीका है अपने बच्चे को ट्रैंड करने के लिए। क्योंकि, इसके लिए न तो आपको डिस्पोजेबल डायपर खरीदने की जरूरत और न ही बच्चों में इससे पड़ने वाले रैशेस की समस्या होती है।

ऐसे में, निचे कुछ टिप्स बताए जा रहे हैं जिसके जरिए आप अपने एक साल के बच्चे को पॉटी की ट्रैंनिंग दे सकते हैं, जो इस प्रकार हैं-

  • बच्चों में इस प्रक्रिया की शुरुआत उस वक़्त की जानी चाहिए जब आपके बच्चे 6 महीने के हो गए हों या फिर वह खुद से अपने सपोर्ट पर बैठ पा रहे हों। इस मामले में, आशा पणिक्कर जी ने कहा है कि जब मेरा बेटा पाँच महीने का और बेटी चह महीने की थी तब से ही ये लोग बैठना शुरू कर दिए थे। इसलिए सबसे पहले आप इस बात का ध्यान रखें कि आपका बच्चा किस उम्र में और कितनी बार सुसु और पॉटी करता है। जब आप उन्हें ध्यान से निरीक्षण करेंगे तब आप उनके सुसु करने  के अंतराल में कुछ हद तक समानता पायेंगे। खासतौर से दो से तीन घंटे के बीच में।

  • हालाँकि, एक बार जब आपको यह पता चल जाएगा कि आपका बच्चा कितनी बार सुसु और पॉटी करता है, तब आपके लिए यह चीजें और भी आसान हो जाएंगी। मान लें कि आपका बच्चा सुबह 7 बजे सुसु किया, अब आप एक फ्रेश डायपर उसे पहना दें। उसके बाद खुद के लिए एक 9 बजे का अलार्म सेट कर लें, जैसे ही आपका अलार्म बजे वैसे ही आप अपने बेबी को बाथरूम ले जाएं और उसे पॉटी सीट पर बिठायें और उसे अच्छे से पकड़ लें। उसके बाद आप वाश बेसिन या नहाने वाला नल को खोल दें। ऐसे में आप यह देखेंगे कि पानी की आवाज सुन कर आपका बच्चा सुसु कर देता है। इस तरह के प्रभाव न केवल छोटे बच्चों में देखने को मिलता है बल्कि बड़ों में भी इसका प्रभाव समान रूप से होता है। हो सकता है कि इसके लिए अभी शोध चल रहा हो लेकिन, इनका कहना है कि मैं इस तरह के परिणाम हमेशा देखती हूँ।

  • सामान्यतः एक लड़के के लिए पॉटी सीट पर बिठा कर सुसु कराना थोड़ा मुश्किल है। ऐसे में, लड़कों को सुसु कराते समय इस बात का ध्यान रखें कि जब भी वो यूरिन पास करे तब वह सही जगह पर करे इसके लिया आप उसे अच्छे से पकड़ लें। ताकि बच्चे सुसु इधर-उधर न कर दें।  

  • पॉटी के लिए सबसे जरूरी जो बात है वह यह है कि आपका बच्चा किस तरह का आहार लेता है और कब लेता है। क्योंकि, कुछ खाद्य पदार्थ दूसरों की तुलना में एक रेचक प्रभाव (लेक्सेटिव) को पैदा करते हैं। दूसरी ओर यदि आप अपने बेबी को डब्बाबंद खाद्य पदार्थ देते हैं तब वह देर से पचता है। वहीँ यदि आप घर का बना हुआ खाना देते है तब वह आसानी से और जल्दी पचता है। खासकर, 6 से 7 महीने में उनके पॉटी का फ्रीक्वेंसी दिन में दो से तीन बार हो जाता है। हालाँकि, आप अपने बच्चे में पॉटी ट्रेनिंग भी बिल्कुल सुसु की तरह दे सकते हैं। हालांकि, इसके लिए रनिंग वाटर साउंड की जरूरत नहीं है।   

  • पॉटी ट्रेनिंग को बेहतर बनाने के लिए आप लगातार अपने बच्चे से बात करने की कोशिश करते रहें। इसके लिए आप यह कोशिश करें कि जब भी आप अपने बच्चे से बात कर रहें हों तब उनके साथ एक ही शब्द का बार-बार प्रयोग करें। ऐसे आप यह देखेंगी कि कुछ ही महीनों में आपका शिशु आपके बातों को अपने ही भाषा में जबाव देने की कोशिश करेगा। उसके बाद जब बच्चे 9 से 10 महीने में बोलना शुरू करते हैं, जैसे कि मम्मी, पापा, दादा, दादी जैसे एक-एक शब्दों को तब आप जिस तरीके से एक ही शब्दों को बार-बार दोहराते हैं, तब बेबी भी यह समझने की कोशिश करता है कि उसका अगला कदम क्या होगा। इतना ही नहीं जब बेबी थोड़ा-बहुत बोलना और समझना शुरू कर देता है तब वह पॉटी करने और कराने की भाषा को भी समझना शुरू कर देता है।  

कुछ अतिरिक्त टिप्स: जब भी आपअपने बच्चे को पॉटी ट्रैनिंग दे रहें हों तो संयम बरतें क्योंकि, इसमें थोड़ा समय लगता है। इतना ही नहीं, इस दौरान धैर्य और स्थिरता सबसे अधिक मायने रखता है। इसके अलावा, इस दौरान आपके न चाहते हुए भी कुछ गलतियां हो सकती है, इसलिए इस दौरान न घबराएं। आखिरकार, यह एक छोटे बच्चे हैं। क्योंकि, इनको और इनके संकेतों को समझना थोड़ा मुश्किल है, जो एक उम्र में आने के बाद सब सामान्य हो जाता है।

(In association with Nobel Hygiene/Teddyy’s Diapers)

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