आपके नोक-झोक का असर ना पड़े आपके बच्चों पर 

 

 

बच्चे हर माता-पिता की जिम्मेदारी होती है जिसे निभाना आज के दौर  में थोड़ा मुश्किल काम है। ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि सबके विचार एक जैसे नहीं होते हैं । खास कर पति-पत्नी के। एक भी थोड़ा सुस्त और आलसी किस्म का होता है तो वहीं दूसरा हिटलर प्रवृति का यानि हुक्म चलाने वाला होता है। जिससे की दोनों के बीच बीच नोक-झोक आम बात है। और ऐसे में इसका खामियाजा कहीं न कहीं बच्चों को भुगतना पड़ता है। यहाँ पर कुछ आसान से टिप्स बताये जा रहे हैं जिससे की इसका असर आपके बच्चों पड़ ना पड़े, इसपर नज़र डालें

 

 

रुल नंबर 1- अपने बच्चों के सामने आपस की बातें ना करें क्योंकि आज के बच्चे बहुत स्मार्ट होते हैं। जब भी आप लोग किसी भी मुद्दे पर बहस करें तो अकेले में करें । बच्चों के सामने भूलकर भी ना करें।  अगर करें भी तो किसी  संकेत या कोड वर्ड  के तहत करें क्योंकि कहीं न कहीं इसका असर आपके बच्चों पर पड़ता है। आप दोनों को लड़ता हुआ देख कर उनके मन में डर की भावना पैदा हो सकती है।

 

बच्चों के सामने कोई गलती ना करें- कभी-कभी बच्चों को अपने माता-पिता में अच्छाई दिखती है तो कभी बुराई। ऐसे में पेरेंट्स को चाहिए की बच्चों के सामने अपने रिश्ते का संतुलन बना कर रखें।

 

कुछ नियम बनायें- दोनों मिलकर कुछ नियम बना लें की कब क्या बोलना है और किसके सामने। कई बार आप अपने जीवन साथी कि बात से सहमत नही होते और अकेले में बात करने से मना कर देते हैं । कोशिश ये करें कि ऐसे बहस को अकेले में सुलझा लें। पत्नी के बनाये नियम को उसकी गैरहाज़री में तोड़े नही ।इसका बच्चे पर गलत असर होगा ।

भारतीय परिवेश में जब आपसी मुद्दा ज्यादा जटिल हो जाता है तो ऐसे में दादा-दादी भी इसमें कूद पड़ते हैं और एक दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाते हैं।ऐसे में आप यह घरेलू सद्भाव के लिए महत्वपूर्ण है।  उसको बनाये रखें ।

 

 

बच्चों के सामने एक-दूसरे की बुराई ना करें- बच्चों के सामने भूल कर भी एक-दूसरे को दोषी ठहराने की कोशिश ना करें।  गलत सही न ठहराएं एक दूसरे को ,क्योंकि बच्चों की नजर में पेरेंट्स एक सामान होते हैं। इसलिए उनके नजर में महान बनने की गलती नहीं करें। क्योंकि बच्चे का दिमाग बहुत कोमल होता है वो अपने पेरेंट्स के लिए अपने मन में गलत धारणा बना लेंगे।

 

सहायता के लिए पूछें- हर पति-पत्नी के बीच नोक-झोक होती है। लेकिन कुछ फैसले ऐसे होते हैं जहाँ दोनों की सहमति अनिवार्य है। खासकर बात यदि अपने बच्चों की हो तो पेरेंट्स को साथ मिलकर उनके अच्छे-बुरे का फैसला करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर यदि आपकी बेटी बहुत देर तक सोती है ये बातें आपस में सोच कर निर्णय लें। उसकी इस आदत को कैसे सुधारा जाये। कुछ पेरेंट्स ऐसे है जो अपने बच्चो वैसे ही पालना चाहते हैं जैसे उनके माता – पिता ने उनको बड़ा किया है । वही कुछ इसके बिलकुल विपरीत होते हैं । असल में किसी को नही पता होता है आगे बच्चा क्या करेगा और कैसा होगा. इसलिए उसका साथ दें ताकि वो खुद को साबित कर सके।

 

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