Dinner Conversations


मां की मैराथन तो कभी खत्म नहीं होती

 

मां हो जाना, मिनिट भर की कोई घटना नहीं है। कि लीजिए उस एक मिनिट में, मैं एक मुकम्मिल मां बन गई। लेबर पेन से गुजरने के बाद, एक जिंदगी को इस दुनिया में ला देना भर मां हो जाना नहीं है। मां बनना, एक मुसलमल चलने वाली प्रक्रिया है, जो बच्चों के बूढे हो जाने तक भी पूरी नहीं होती।

 

असल में जब कोई लड़की ब्याह के बाद मां बनने के वक्त से गुजर रही होती है । वो नौ महीने एक नए अहसास से ज्यादा,  अजीब खौफ में गुजरते हैं। उन सवालों में गुजरते हैं कि क्या क्या मैं,  इस वक्त के लिए खुद को तैयार कर पाई हूं। असल में ये सवाल ही हैं जो एन वक्त पर हमारे लिए मुश्किल खड़ी करते हैं। फिर, घंटे दिनों में और दिन महीनों में गुजरे और कब वो वक्त आ जाता है कि  जब किसी भी घड़ी आपकी जिंदगी बदल जाएगी।  जाने कितने दिनों, महीनों, और सालों के लिए।

पलटकर देखिए तो क्या रह जाती हैं, अब वैसी  बेफिक्र शामें। देर रात की गपशप और दोपहर तक खिंचती आती सुबह की  सुस्ती। जैसे ये सब बीते जमाने की बात हो। लेकिन   क्लब ,  सिनेमाहॉल प्ले थियेटर के बजाए, कॉलोनी के बगीचों में नन्हे के पीछे पीछे भागती  शामें, अपने जिगर के टुकड़े की थपकियों में सुबह तक जागती रातें सज़ा नहीं मज़ा देती हैं। और यहीं होता है वो एक लम्हा कि जहां  हौले हौले कल की अल्हड़ सी कोई लड़की जिम्मेदार मां बन रही होती है।

जाने कब होता है ये कि खुद जाड़ों में स्वेटर फेंक कर भाग जाने वाली लड़की, अपने बच्चे के सिर  की टोपी से लेकर दस्ताने तक सर्दी की पूरे वर्दी लिए उसके  पीछे घूमती रहती  है। खुद मां को पीछे दौड़ाने वाली, अब अपने दिल के टुकड़े की ख्वाहिशों के पीछे भाग रही होती है। वो ख्वाहिशें जो उस बच्चे के हाथ आती हैं  और फिर नई ख्वाहिशों का पुलिंदा खोलकर हवा हो जाती है।

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हैरानी की बात ये है कि हिन्दुस्तान जैसे मुल्क में तो लड़कियां  मां बनने के अहम फैसले की चुनौतियों के साथ त्याग की नई इबारत भी लिख रही होती हैं। चुनिंदा लड़कियां होंगी जो पहले ब्याह और फिर मां बन जाने के बाद अपने सपनों की जिंदगी को जी पाईं। वरना तो हमेशा ही वो  अपनों के सपनों को अपने जीने की वजह बना लेती है। हैरानी होती है तो तसल्ली भी है इस बात की, कि भारतीय समाज में अब भी स्त्री अपने सपनों को तज कर भी खुशी खुशी जीना जानती है।  वो अपने बच्चों की हसरतों में अपने जीने की वजह तलाश लेती है। लेकिन जैसे औरत की जिंदगी में हर उम्र का एक किरदार है। इसी तरह मां को भी ये समझना चाहिए कि कब इस जिम्मेदारी को निभाते हुए अपनी दुनिया में लौट जाना है। उस दुनिया में जिसके दरवाजे एक कामकाजी लड़की खुद बंद करके आगे बढी थी। ये सही है कि वापसी इतनी आसान नहीं होती।  कई बार हम वक्त से काफी पिछड़ चुके होते हैं। इसीलिए जरुरी है कि मां बन जाने के बाद भी आपका बाकी दुनिया से जुड़ाव बना रहे। ये मुश्किल है नामुमकिन नहीं। एक पुल तो बनाए रखना होगा हमेशा कि जहां से आप ससम्मान वापसी कर सकें।

वरना एक दिन अपने आप से कोफ्त होने लगेगी आपको। अपने आप से होंगे सवाल कि अब जब आठ घंटे के लिए बच्चा स्कूल में है तब मैं क्या करूं ।

तो दरवाजे बंद मत कीजिए। तैयारी रखिए कि जब आपका बच्चा आपके सहारे उम्र की दुश्वारियों से जुझता आगे बढ रहा हो, तो आप भी तैयार रहिए कि वापसी किसी भी वक्त करनी है। ताकि जब बच्चा बड़ा होकर अपने मुताबिक अपनी सुबहें और शामें संभाल ले, तो आप खाली ना हो जाए।  वक्त रहते लौट आइए जिंदगी की रेस में। मां की मैराथन तो कभी खत्म नहीं होती।

Featured image Shifalee Pandey with her kid

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